10+ Pigs Wild Boar infectious diseases – African swine fever

Pigs – Wild Boar infectious diseases with African swine fever सूअर – जंगली सूअर के कुछ प्रमुख संक्रामक रोग निम्नलिखित हैं:-

African swine fever सूकर ज्वर या सूकर विसूचिका -यह एक भयानक संक्रामक रोग है। यह रोग सर्वप्रथम सन् 1883 ई० में देखा गया। अब यह रोग संसार के उन सभी देशों में पाया जाता है जहाँ सूकर पालन व्यवसाय होता है।

सूकर ज्वर के लक्षण मुख्यतः– रोग की तीव्रता और शिथिलता पर निर्भर करता है। जब रोग का प्रकोप बहुत तीव्र होता है तो रोगी सूकर मुश्किल से दस दिन जिन्दा रह पाता है।

ऐसे जानवर बहुत कम होते हैं जो इस स्थिति से बच पाते हैं। तेज बुखार होना (तापमान धीरे-धीरे 105 फा० से 107 फा० तक हो जाता है) अरूची तन्द्रा. के और दस्त, सांस लेने में कठिनाई, शरीर पर (अधिकतर कान के ऊपरी भाग की चमड़ी, जाँघ की निचली पर्त तथा पेट की खाल) लाल तथा पीले धब्बे निकल आना इस रोग के मुख्य लक्षण हैं। आरमिक अवस्था में सूकर ज्वर African swine fever को रोकना बहुत ही कठिन होता है।

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सूअर की सबसे अच्छी नस्ल।

रोग के समय अगर रक्त की जांच की जाय तो उसमें सफेद कणों की बहुत कमी पाई जाती है। इस रोग के रोकथाम के लिए रोग की विभिन्न अवस्थाओं, के लक्षणों तथा शव की जांच सावधानीपूर्वक की जानी चाहिए।

1. बीमार सूअर को तुरन्त झुण्ड से अलग कर देना चाहिए।

2. उन सूअरों को जो स्वस्थ हैं या अभी रोग लगा है उन्हें खुली धूप में 10-15 दिन तक खुला छोड़ देना चाहिए तथा उनके लिए खाद्य सामग्री घास, फूस आदि का अलग से प्रबन्ध करना चाहिए अर्थात् उन जगहों से नहीं लाना चाहिये जहाँ रोग फैला हुआ है।

3. सूअरों के रहने की जगह पर रोगाणु नाशक दवा का छिड़काव जरूरी है।

4. यदि रोग फैल चुका हो तो रोगी सूअरों के सम्पर्क में आने वाले अन्य सूअर को टीका लगा कर बचाया जा सकता है।

5. रोगी सूअरों के सम्पर्क में आने वाले अन्य सूअरों को हाईपर इम्यून सीरम द्वारा भी बचाया जा सकता है तथा बाद में उनकी सूकर ज्वर का टीका लगाया जा सकता है। टीके की 5 मिलीग्राम की मात्रा लगभग 14 29 दिनों में इस रोग से छुटकारा दिला देती है और इसका असर 8 महीने से 1 महीने तक बना रहता है।

6. रोगी के इलाज के लिए एंटीबायोटिक का प्रयोग किया जा सकता है मगर उचित यही है कि संक्रमित सूकरों को मार दिया जाय तथा मरे हुये सूकरों की लाश जला देनी चाहिए।

Pigs – Wild Boar सूकर चेचक (Swine Pox):-

यह भी एक संक्रामक रोग है। यह अधिकतर कम उम्र वाले सूकरों को होता है।

इस रोग के मुख्य लक्षण :-

सूअरों को बुखार हो जाना, सुस्त पड़ जाना, भूख न लगना, कान गर्दन तथा शरीर के अन्य भागों पर फफोला पड़ जाना है। रोगी सूकर धीरे-धीरे चलता है तथा कभी-कभी उसके बाल खड़े हो जाते हैं।

रोग के लक्षण

1. बीमार सूकर को तुरन्त झुण्ड से अलग कर देना चाहिए। उसे हल्का-फुल्का भोजन तथा साफ हवादार स्थान पर रखना चाहिए।

2. शरीर पर लगे फफोलों को गर्म पानी में पोटाश घोलकर धोना चाहिए तथा वैसलीन और बोरिक एसिड लगाना चाहिए।

3. स्वस्थ सूअरों को टीका लगवा देना चाहिए।

4. चेचक हुए सूअर को बचा के ख्याल से मारकर जला देना चाहिए।

खुरहा-मुंहपका (FOOT AND MOUTH DISEASE):-

यह जल्द फैलने वाला संक्रामक रोग है। यह रोग हर उम्र के सूकरों में पाया जाता है तथा विश्व के समस्त देशों में जहां सूअर पालन होता है पाया जाता है।

रोग के लक्षण:-

इस रोग से ग्रसित पशुओं को बुखार हो जाता है तथा खुर और मुह में छोटे-छोटे घाव हो जाते हैं और सूअर लगा कर चलते है पैर के घाव वेदनायुक्त होते हैं तथा मुंह में छालों के कारण खाने में तकलीफ होती है पशु सुस्त हो जाता है तथा भूख से मर जाता है।

रोकथाम के उपाय:-

1. इस रोग से आक्रांत सूअर को भी झुण्ड से अलग कर देना चाहिए।

2. सूअरों को साफ और सूखी जगह पर रखना चाहिए तथा हल्का-फुल्का खाना जैसे-गेहूँ या चावल की काजी पिलानी चाहिए।

3. 1 प्रतिशत कॉपर सल्फेट या फिनाइल लोशन खुर के घावों पर लगाना चाहिए। इसके घावों पर देहात में नीम का पत्ता भी पीसकर लगाना चाहिए।

4. मुंह पर से फोड़े फटने पर पोटाश के द्रव से फिटकिरी के द्रवण से या बोरिक एसिड से द्रव्य से घोना चाहिये।

प्लीहा जहर या जहरी बुखार (Anthrax):-

यह जल्द फैलने वाला खून का संसर्गजन्य रोग है सूअर में इसका प्रकोप बहुत कम पाया जाता है।

रोग के लक्षण:-

इस रोग में ज्वर बढ़ जाता है, नाड़ी तेज गति से चलती है, हाथ पैर ठडे पड़ जाते हैं । पशु की अचानक मौत हो जाती है। पेशाब में भी रक्त आता है। इस रोग में सूट के गले में सूजन हो जाती है।

बचाव के उपाय:-

1. इस रोग में भी आक्रांत सूअरों के झुंड से अलग कर देना चाहिए तथा साफ पानी और आहार देना चाहिये।

2. स्पोर वैक्सीन का टीका लगवाना चाहिए । रोगी सूकर के सम्पर्क में आये अन्य सूअर को हाईपर इम्यूनसीरम दिया जा सकता है मगर इसका असर केवल 15 दिनों तक रहता है एन्टीसीरम का प्रयोग भी लाभप्रद है।

3. रोगी मृत पशु के नैसर्गिक छिद्रों में जन्तु नाशक द्रवण में कपास की रूई भिंगोकर बंद कर देना चाहिए। शव को खुला रखना खतरनाक है।

4. रोग से मरे हुए सूअर को जल्द गड़वा देना चाहिए तथा मवेशी को निरोधक टीका तुरन्त लगवा देना चाहिये।

एरिसिपेलस – Pigs – Wild Boar infectious diseases:-

यह भी एक संक्रामक रोग है तथा सूकरों में बहुधा पाया जाता है।

रोग के लक्षण:-

इस रोग के खास लक्षणों में तेज बुखार खाल पर छाले पड़ना. कान लाल हो जाना तथा दस्त होना है। रोग के तीव्र प्रकोप में अचानक मौत हो सकती है। रोगी सूअर को निमोनिया का खतरा हमेशा रहता है।

रोकथाम के उपाय:-

1. रोगी सूअर (Pigs – Wild Boar) को झुण्ड से अलग करना चाहिए तथा उनके लिये साफ-सुथरे आवास और खान-पान की व्यवस्था होनी चाहिए।

2. निरोग सूअरों को रोग निरोधक टीका लगवाना आवश्यक है।

3. पेनिसिलिन का प्रयोग रोग निदान में सहायक एन्टीसीरम 30-100 सी सी तक दिया जा सकता है।

Pigs – Wild Boar infectious diseases यक्ष्मा (Tuberculosis):-

यह भी एक खतरनाक बिमारी है।

रोग के लक्षण:-

सबसे पहले रोगी के किसी अग में मस्सा निकल जाता है जो बाद में चलकर फूट जाता है और उससे मवाद निकलने लगती है और इसके अलावा रोगी को बुखार भी हो जाता है।

रोकथाम के उपाय:-

  1. रोगी सूअरों (Pigs – Wild Boar)के लिए साफ आवास का प्रबंध।

2. उचित यही है कि जिन सूकरों में तपेदिक के लक्षण पाये जाए उन्हें मार डाला जाय तथा गाड़ दिया जाय।

पेचिश (Dysentry) – Pigs – Wild Boar infectious diseases:-

यह सूअर की आम बीमारी है।

रोग के लक्षण:-

रोगी सूकर (Pigs) सुस्त हो जाता है तथा हर क्षण लेटे रहना चाहता है। यह तेजी से दुबला होता है तथा उसे थोड़ा सा बुखार हो जाता है।

रोकथाम के उपाय:-

1. रोगी सूकर को स्वस्थ सूकरों से अलग कर देना चाहिये।

2. हल्का सुपाच्य भोजन तथा साफ पानी देना चाहिए। मांस का टुकड़ा नहीं देना चाहिए।

3. पेशाब पैखाना तुरन्त साफ कर देना चाहिए।

Pigs – Wild Boar infectious diseases – इन्फ्लूएंजा (Influenza):-

यह बीमारी सूअर में आम है।

रोग के लक्षण:- सूकर की आँख और नाक से पानी बहने लगता है। जोड़ों पर खासकर पिछले जोड़ों पर सूजन आ जाती है। इसके अलावा खासी और बुखार इसके प्रमुख लक्षण हैं।

1. रोगी सूअरों (Pigs) को अलग कर देना चाहिए तथा घास-फूस का मोटा बिछावन देना चाहिए।

2. सूअरों (Pigs – Wild Boar) के खाने के लिये हरे चारे का प्रबन्ध आवश्यक है।

Pigs – Wild Boar infectious diseases – परजीवी जन्य और पोषाहार सम्बन्धी रोग:-

उपर्युक्त संक्रामक रोगों के अतिरिक्त गन्दे रहन-सहन तथा खान-पान के कारण सूकरों में कई तरह के परजीवी अन्य रोग भी हो जाते है । इन सब बीमारियों से बचाया जा सकता है अगर हम सूअर के रहने के स्थान को साफ-सुथरा, हवादार तथा सूखा रखे उनको एक जगह आवश्यकता से अधिक झुण्ड में न रखें तथा उनके भोजन में विटामिन तथा प्रोटीन जैसे पोषक तत्वों का पूर्ण रूप से ध्यान रखें।

Pigs - Wild Boar infectious diseases with African swine fever
Pigs – Wild Boar

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