Best Lemon Farming in India – नींबू की खेती कैसे करें?

Lemon Farming in India – नींबू की खेती कैसे करें?

नींबू का उत्पादन व्यापारिक दृष्टिकोण से उष्णकटिबंधीय एवं उप उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में की जाती है भारत दुनिया के देशो में लाईम एवं लेमन उत्पादन में पाँचवा स्थान रखता है।

Lemon Farming in India - नींबू की खेती कैसे करें?
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नींबू की खेती के लिए जलवायु एवं मिट्टी केसा होना चाहिए।

एसिड लाईम के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु की आवश्यकता होती है. इसकी खेती के लिए गर्म मध्यवर्ती आर्द, तेज हवा एवं पालारहित जलवायु आदर्श मानी जाती है इसकी खेती औसत समुद्री सतह से 1000 मीटर की ऊंचाई पर भली प्रकार की जा सकती है। बशर्ते कि आर्दता कम एवं अनुकूल हो। रंगपुर लाईम के लिए अनुकूल तापक्रम 20-30 से ग्रे है। आर्द क्षेत्रों में यह स्कैब रोग से ग्रसित हो जाता है। एसीड लाईम की खेती काली मिट्टी एवं हल्की दोमट मिट्टी में भली प्रकार की जा सकती है। इसके अधिक विकास एवं उपज के लिए अच्छी जल निकास, 6.5 से 70 पी0एच वाली मिट्टी अच्छी होती है।

नींबू का प्रभेद:-

एसिड लाईम साधारणतः- खेती की जानेवाली एसिड लाईम है। जिसे कागजी नींबू कहा जाता है। महाराष्ट्र में प्रमालिनी’ एवं विक्रम दो प्रभेद एक पूर्वजक (Clonal Selection) द्वारा पहचानित किये गये हैं एवं इन्हें व्यापारिक तौर पर उत्पादन हेतु विमुक्त किया गया है, क्योंकि ये कंकर से मुक्त तथा प्रचुर मात्रा में फल देते हैं।

प्रमालिनी :- प्रमालिनी साधारण कागजी नींबू से यह प्रभेद 30% अधिक उपज देते है। इनके फलों में 57% रस होता है।

विक्रम:- इसके फल 5-10 के गुच्छे में होते हैं इसका उत्पादन साधारण लाईम से 30-32% ज्यादा होता है।

चक्रचर:- यह बीज रहित होता है इसके फल गोल होते हैं। इसमें 60-66% बीज रहित रस होता है।

पी.के.एम. 1:- इसके फल गोल, मध्यम बड़े आकार एवं आर्कषक पीले रंग का छिलका लिए होता है।

सलेक्शन 49:- इसके फल बड़े आकार के होते है। इसके फल ग्रीष्मकाल में आते हैं तथा कैंकर ट्रीसटेजा एवं पत्ती छेदक रोग के प्रतिरोधी हैं।

स्वीट् लाईम:- इसके दो प्रभेदों की खेती भारत में होती है।

मीठा चिकना:- इसके फल गोलाकार पीला रंग, चिकना, चमकदार सतह तेल ग्रंथी युक्त, छिलका पतला कठोर, मध्य कड़ा गूदा, रसदार एवं कम बीज वाले होते है।

रंगपुर लाईम:- इसका छिलका एवं गूदा नारंगी का छिलका पहला एवं गूदे से जल्द अलग हो जानेवाला होता है। इसकी खेती मुख्यतया प्रकद के लिए की जाती है। इससे लाईमने बनाया जाता है।

लेमन :- लेमन को दो अलग-अलग समूहों में बाँटा गया है- एसीड लेमन एवं स्वीट लेमन एसीड लेमन की खेती भारत में होती है लेमन को चार समूहों में विभाजित किया गया है।

युरेका:- इसके फल का रंग लेमन पीला, झुरीदार सतह, अधिक रसदार, पूरा अम्लीय गुणवत्ता एवं गंध सुहावना एवं 6 -10 बीज होते है।

लखनउ:- सीडलेस इसके फल अंडाकार, लेमन पीला, चिकना शीर्षनुकीला पतला छिलका, खाली मध्य रेखा, 10-13 हिस्सों में बंटा हुआ, रसदार, गंध अच्छा एवं खट्टा, लगभग बीज रहित होते हैं तथा नवम्बर – जनवरी तक पकते हैं।

कागजी कलान:- इसके फल का आकार मध्यम गोल, पीला, आधा गोल, पतला छिलका, चिकना, गूदा अम्लीय, हल्का, पीला, रसदार एवं 8-13 बीज होते हैं।

नेपाली आबलौंग (आसाम लेमन):- इसके फल दिसम्बर-जनवरी तक पकते हैं।

पंत लेसन 1:- इसके फल मध्यम आकार (80-100 ग्राम) गोल एवं चिकना पतला छिलका, रसदार, कैंकर, ट्रीसटेजा, डाईबैंक प्रतिरोधी होते है।

नींबू की खेती के लिए खेती की तैयारी कैसे करें।

अगर मिट्टी नयी हो तथा पूर्व में खेती नहीं की जा रही हो तो इस मिट्टी को अच्छी प्रकार जोत-कोड कर बोआई के लिए तैयार करना होगा। इस मिट्टी पर आये हुए अनावश्यक वनस्पति, खर-पतवार को साफ कर देना चाहिए, इसके बाद 2-3 बार गहरी जुताई करनी चाहिए तथा मिट्टी को बराबर कर देना चाहिए।

अन्तराल एवं रूप रेखा:- लाईम की रोपाई 4-6 मीटर दूरी पर करनी चाहिए। प्रारम्भ में पौधों की दूरी 8-10 वर्षों तक 3 मी. x 3मी रखनी चाहिए फिर एकांतर पंक्ति (Alternative row) को काटकर हटा देना चाहिए। जिससे पौधों को फलने हेतु पर्याप्त जगह मिल सके। रंगपुर लाईम साधारणतया मेढ़ पर लगाये जाते हैं या रोड के दोनों तरफ नर्सरी के कोने में 4 6 मी की दूरी पर लगाना श्रेयकर होता है। लेमन, लाईम की अपेक्षा ज्यादा फैलते, इसलिए लेमन की दूरी लाइम से अधिक होनी चाहिए।

गढढा बनाना एवं भरना:- बुआई के 2 3 सप्ताह पूर्व काल में 60 से. मी. x 60 से.मी. x 60 सें. मी के गढ़े तैयार किये जलवायु मिट्टी एवं स्थान को ध्यान में रखते हुए गढ्ढे दिन तक धूप मिलने के लिए छोड़ दिया जाता है, फिर गये सूखी पत्तिया या पुआल रखकर रोगाणुमुक्त करने हेतु जला दिया जाता है। बुआई के 15 दिन पूर्व गढ्ढे की आधी निकाली गयी मिट्टी फार्म यार्ड मैन्युर + हड्डी की खल्ली या सुपर फॉस्फेट एवं कीटनाशक को मिलाकर भर देना चाहिए फिर मिट्टी को स्थिर करने हेतु पानी देना चाहिए।

बुआई:- हल्के वर्षा वाले क्षेत्र में मानसून प्रारम्भ (जून – अगस्त) होने पर रोपाई करनी चाहिए। जिससे पौध वर्षा का उपयोग कर सके।

नये पौध की देखभाल:- नये पीच को प्रारम्भ के 3-4 वर्षो तक गर्मी आर्दता एवं तढ़ से बचाना पड़ता है। उत्तरी समतली क्षेत्रों में पौध के कम तापमान तथा पाला से बचाने के लिए जल्द-जल्द हल्की सिचाई देना तथा बगीचे को वायु अवरोध (wind break) से घेर देना श्रेयकर होता है। फ्लशिंग के पूर्व नाईट्रोजनीय उर्वरक का हल्का प्रयोग करना चाहिए। नए लगाये पौध को जल्दी-जल्दी सिंचाई देना श्रेयकर होता हैं।

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नींबू की खेती के लिए ट्रेनिंग एवं काट-छांट करना:-

लाईम:- छोटे एसिड लाईम पौधों को सेंट्रल लीडर प्रद्धति के रूप में ट्रेन्ड किया जाता है, धड़ पर जमीन से 75 सेमी की ऊँचाई पर आनेवाले नये कोपलों को हटा देना चाहिए। फल काटने के तुरंत बाद पौधे की छँटाई कर देनी चाहिए एवं जल्द कटे हुए भाग को बॉडों पेस्ट या ब्लाटॉक्स से उपचारित कर देना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक:- साइट्स के लिए कार्बनिक खाद का प्रयोग हमेशा लाभप्रद होता है। नाईट्रोजन का प्रयोग फार्मयार्ड मैन्यूर (256) तेल, खल्ली (25%) एवं रासायनिक उर्वरक (50%) के रूप में तथा फास्फेट एवं पोटाश का प्रयोग सुपर-फास्फेट एवं म्यूरेट ऑफ पोटाश के रूप में क्रमश करनी चाहिए।

पूर्ण विकसित एसिड लाईम वृक्ष में 50 कि. ग्रा. फार्मसाई मैन्यूर 300 ग्राम नैत्रजन, 250 ग्राम फास्फेट तथा 500 ग्राम प्रतिवर्ष देना चाहिए। फार्मयार्ड मैन्युर (एफव्वाई०एम०) एवं फॉस्फेट की पूरी मात्रा एवं नेत्रजन तथा पोटाश की आधी मात्रा वर्षा के बाद तथा शेष नेत्रजन एव पोटाश की आधी मात्रा वर्षा के बाद तथा शेष नेत्रजन एवं पोटाश की मात्रा फूल लगने के पश्चात् मार्च अप्रैल में देनी चाहिए। पौधा विकास की अवधि में अधिक नमी की आवश्यकता होती है।

इसलिए अत्यावश्यक है कि इस अवस्था में उचित सिंचाई की व्यवस्था की जाए। ड्रिप सिंचाई से लगभग 20% तक जल की बचत तथा अधिक उत्पादन एवं गुणवत्ता के फल उत्पादित होते हैं। गर्मी मौसम में लाईम एवं लेमन को 5-7 दिन के अन्तराल में सिचाई देनी चाहिए तथा ठंढे मौसम में 10-15 दिन के अन्तराल में सिचाई देनी चाहिए।

रख-रखाव:- उष्ण कटिबंधिय जलवायु में मल्चिंग का मुख्य स्थान है। निकौनी करने के पश्चात बेसीन को सूखी पत्तियों धान का भूसा, मूगफली का छिल्का, लकडी का बुरादा सीरियल फसल का पत्तवार, नारियल का रेशा एवं सूखे घास से मल्चिंग कर देना चाहिए।

खर-पतवार नियंत्रण:- साईट्स बगीचे का खर-पतवार नियंत्रण मोनोरॉन’ ड्युरॉन एवं ग्रामोजोन के प्रयोग से किया जाता है।

फलों की तुड़ाई एवं व्यवस्थापन:- लाईम एवं लेमन का रंग हरा पीला होने लगता है। हरा रंग के स्थिति में भी तैयार फल को तोड़ाई की जा सकती है। जिससे इसके अम्लीय गुण का भी उपयोग किया जा सके।

फल को खीचकर तोड़ना नहीं बल्कि कली पर से काटना चाहिए। अधिकतर फल की तोड़ाई लम्बे बास में बंधे हुए लोहे के हुक एवं जाली द्वारा की जाती है। एक अच्छा लाईम पौधा से वर्ष में 2000-5000 फल प्राप्त होते हैं, जबकि यह संख्या औसतन 3000-3500 फल प्रति वर्ष है। एक लेमन पेड़ द्वारा औसतन 600-800 फल / पेड प्राप्त होता है। इसकी संख्या अनुकूल परिस्थिति में 1000-1200 फल / पेड़ हो सकती है।

काटे गये फल को पैकिंग करनेवाले जगह पर जल्द से जल्द लाना चाहिए। इन्हें सूर्य की रोशनी में ज्यादा देर तक नहीं रखना चाहिए। साईट्रस फलों का हरा रंग कैल्शियम कार्बाइड द्वारा पकनेवाले चैम्बर में हटाया जाता है। जो फल के गुणवत्ता को बदले बिना पीला रंग प्रदान करता है। एक साधारण तकनीक विकसित किया गया है।

जिससे टाहीटी लाइम का रंग हरा रहित हो जाता है। इस तकनीक में पूरा विकसित लाईम पकने के लिए रखे केले के साथ वायुबद चैम्बर में 6.1 (लाईम केला) के अनुपात में रखा जाता है। केला पकने के क्रम मे केले से इथीलिन गैस निकलती है जो लाईम का 24 घंटे के अन्दर हरा रंग हटा देती है।

बैक्सींग (Waxing) एक तरीका है। जिससे फल का मुरझाना तथा झुरी बनना रूक जाता है, जिससे इसकी अपनी जीवतता बढ़ जाती है फल को 12% की वैक्सोल घोल में डुबाने से इसकी भडारीकरण अवधि बढ़ जाती है।

विकास नियंत्रक 2, 4- डी एवं 2. 4. 5 टी० के प्रयोग से फल का जीवन काल बढ़ जाता है। फल का जीवन काल 2 4 D के घोल में डुबोने से 25 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है। एसिड लाईम कोल्ड स्टोरोज में 6 8 सप्ताह तक 8.3 – 10 से ये तापक्रम एवं 85-90% आर्द्रता पर संग्रहित किया जा सकता है। वहीं लेमन 8-12 सप्ताह तक 72 *8.6° से ग्रे तापमान तथा 85-90% आना पर संग्रहित किया जा सकता है।

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