कालमेघ क्या है? कालमेघ की खेती कैसे करें?

कालमेघ क्या है? (What is Kalmegh in Hindi?)

आयुर्वेद में पेट संबंधी रोगों में प्रयुक्त होने वाले पौधों में कालमेघ एक प्रमुख औषधीय पौधा है। तिक्त गुण के कारण यह चिरैता (swaritiya chiraita) के स्थानापन्न द्रव्य के रूप में भी प्रयुक्त होता है। राज्य में यह चिरायता के नाम से जाना जाता है। घरेलू माँग की आपूर्ती के लिए इसे जंगलों से इकठ्ठा किया जाता है।

कालमेघ का पौधा उन्नत शाखीत एक वर्षीय हरे रंग का होता है जिसकी ऊँचाई 60 सेन्टीमीटर से एक मीटर तक होती है। इसकी शाखाएँ पतली, विपरीत, पत्र हरे तथा नोकदार होते हैं। पुष्प छोटे, श्वेत गुलाबी रंग के होते हैं।

कालमेघ क्या है? कालमेघ की खेती कैसे करें?


यह पौधा एकेन्थेसी कुल का है जिसकी करीब 40 प्रजातियाँ हैं। भारत में उपलब्ध 19 प्रजातियों में से एन्ड्रोग्राफिस पैनीकुलाटा, एन्ड्रोग्राफिस एलाटा एवं एंड्रोग्राफिस इनवाइंडिस औषधी के रूप में प्रयोग किया जाता है। फल सामान्य, कैप्सुल लम्बोतरा एवं दोनों सिरों पर कम चौड़ा होता है।

कालमेघ का औषधीय गुण:-

औषधी के रूप में इसके पचांग का उपयोग अनेक आयुर्वेदिक एवं यूनानी दवाओं के निर्माण के अतिरिक्त टिंक्चर कालमेघ तथा प्रवाही धनतत्व या लिक्विड एक्स्ट्रैक्ट बनाने में किया जाता है। पौधों से निकलने वाले रसायनिक तत्व के कारण ही यह स्वाद में कडुवा (तिक्त) होता है। इसके पचांग का काढ़ा ज्वर में लाभदायक होता है। यह भूख में वृद्धि करता है एवं चर्म रोग में बहुउपयोगी होता है।

इसके अलावा यह अतिसार, डायरिया, हैजा, मलेरिया ज्वर, जीर्ण ज्वर, मधुमेह, इन्फलयुएंजा, खाँसी, गले का संक्रमण, खुजली, चर्म रोगों, यकृत वृद्धि, रक्तअल्पता, रक्त विकार, ब्लड प्रेशर, बबासीर, इत्यादि में प्रयुक्त होता है। सिर दर्द, अजीर्ण, अतिसार एवं साधारण ज्वर में इसे हींग, सोठ एवं पीपल के साथ चूर्ण बनाकर देते हैं।

मुख्यतः चूर्ण एक ग्राम या कादा 10-15 मि० ली० प्रतिदिन सेवन करना चाहिए। रक्त शोधक होने के कारण इसका उपयोग पिलिया एवं टाईफाईड में भी होता है। बच्चों एवं महिलाओं में पाई जाने वाली शारिरिक दुर्बलता में यह रामबाण की तरह काम करता है।

कालमेघ के विशिष्ट योग:-

इस औषधि का उपयोग मुख्य रूप से चूर्ण, क्वाथ तथा स्वरस के रूप में किया जाता है। आयुर्वेदिक औषधि निर्माण कम्पनियाँ कालमेघ तरल सत्व तथा होमियोपैथिक में कालमेघ ड्राप बनाती है। इन औषधियों का प्रयोग यकृत रोगों, कामला, जॉडिस तथा खून की कमी जैसे रोगों में किया जाता है। कालमेघ नवायस का प्रयोग बच्चों के पाण्डु रोग, जीर्ण ज्वर, यकृत रोगों में अत्यन्त लाभकारी है। कालमेघ नवायस-शुण्डी, काली मिर्च, हरे, बहेरा, आँवला, नागरमोथा, बावडा तथा चित्रक इन 9 द्रव्यों को बराबर भाग में लेकर इसमें सबके समान लौह भष्म मिलाने से बनता है ।

कालमेघ की खेती कैसे करें?

यह वनोषधि वन में प्राकृतिक रूप से उगती पाई जाती है, किन्तु यह एक अत्यन्त ही उपयोगी औषधीय पौधा होने के कारण इसकी खेती व्यवसायिक स्तर पर लाभकारी सिद्ध हुई है।

जलवायु :-

इस पौधे की सफल खेती हेतु आर्ट एवं गर्म जलवायु के साथ प्रचुर मात्रा में धूप की आवश्यकता होती है। मॉनसून के साथ-साथ पौधे में तीव्र वानस्पतिक वृद्धि होने लगती है तथा सितम्बर के अंत में जब वातावरण का तापक्रम कम होना प्रारंभ होता है तो पौधे प्रजनन अवस्था की ओर बढ़ते हैं। पौधे में फूल व फल का बनना दिसम्बर तक जारी रहता है।

मिट्टी:-

कालमेघ की खेती बलूई दोमट से लेकर लेटेराइट प्रकार की मृदा में की जा सकती है, जिसमें जल निकासी की व्यवस्था अच्छी हो। ऐसी कोई भी मृदा जिसमें थोड़ी भी उर्वरा शक्ति होती है कालमेघ उगाया जा सकता है।

खेत की तैयारी:-

इसके लिए सर्वप्रथम खेत की गहरी जुताई करके उसे खर-पतवार से मुक्त कर लिया जाता है। तद्परान्त उस खेत में 2 टन प्रति एकड़ की दर से गोबर की अच्छी पकी हुई खाद / कम्पोस्ट खाद अथवा एक टन वर्मीकम्पोस्ट मिला दिया जाता है। खाद को खेत में अच्छी प्रकार मिला देने के उपरान्त पुनः एक बार खेत की जुताई करके पाट्टा चला दिया जाता है।

बीजों की बुआई एवं शेपाई:-

प्रकृति में कालमेघ का विसरण इसके छिटकते हुए बीजों के द्वारा होता है। व्यवसायिक खेती के लिए भी बीज ही प्रवर्धन के लिए सबसे उपयुक्त हैं। एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 10×2 मीटर की तीन-चार क्यारियों मई माह में अच्छी कोड़ाई कर प्रति क्यारी 250-300 ग्राम की दर से छिड़काव करके बुआई कर देते हैं। बीजों के उपर गोबर की खाद मिली मिट्टी की पतली तह डाल दी जाती है। नियमित सिंचाई से 6-7 दिन में बीजों का अंकुरण हो जाता है। लगभग एक माह में पौध रोपण के लिए तैयार हो जाते हैं।

जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई तक पौधों को पंक्ति से पंक्ति 40 सेन्टीमीटर एवं पौध से पौध 30 सेन्टीमीटर पर लगाया जाता है। पौधा लगाते समय मिट्टी में प्रयाप्त नमी होनी चाहिए। पौध रोपण का कार्य 15 जुलाई से पूर्व कर लेना चाहिये पौध-रोपण में देर होने से पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है।

उर्वरक एवं खाद:-

खेत की तैयारी के समय 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद दें। साथ ही सीमित मात्रा रसायनिक खाद में वानस्पतिक वृद्धि के लिए जरूरी है। नेत्रजन को रोपाई के 30 दिन एवं 45 दिन बाद छिड़काव करें। सिंचाई = बरसात का समय होने पर सिंचाई की जरूरत नहीं रहती, पर लगाने के बाद सिंचाई करना जरूरी है। वर्षा का अभाव होने पर 20-20 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करें।

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निकाई-गुड़ाई:-

पहली निकाई फसल रोपण के लगभग 20-25 दिन उपरान्त करनी चाहिये, तथा दूसरी निकाई 40 दिन के बाद इस प्रकार हाथ से दो निकाई कर देने से फसल अधिकांशतः खरपतवारों से मुक्त हो जाती है।

कटाई एवं सुखाई:-

कालमेघ को अधिकतम शाक उत्पादन के लिए फसल की कटाई रोपाई के 90-95 दिन पर कर लें, इसके पश्चात पत्तियाँ स्वतः झड़ने लगती हैं। कटाई के बाद प्राप्त पूरे पौधों को छायादार स्थान पर सूखाकर चूर्ण बना लेते है। यदि सिंचाई की उचित व्यवस्था हो तो कालमेल की एक से अधिक कटाईयाँ ली जा सकती है।

जब पौधों में फूल आने लगे तथा फलियाँ पकने लगे तो पौधों को जमीन से चार-पाँच ईच उपर से काट कर शाख को सुखा लिया जाता है। फसल काट लेने के बाद पुनः सिंचाई की जाती है, जिससे फसल पुनः प्रस्फुटित होने लगती है। पुनः 60-70 दिन के बाद जब फूल एवं फलियाँ हो जाती हैं तो पौधों को उखाड़ कर सुखा लिया जाता है, इस प्रकार दो फसल प्राप्त हो जाती है।

उपज :- अच्छी प्रकार से उगाई गई फसल से 35-40 क्विंटल प्रति प्रति हेक्टेयर सूखी शाक प्राप्त होती है।


आय-व्ययः- प्रति हेक्टेयर खर्च इस प्रकार है:-

क्र.सं.अवयवराशि (रू / हे०)
1.बीज 2 के० जी०1500.00
2.नर्सरी एवं बिचड़ा तैयार करना खेत की तैयारी300.00
3.खेत की तैयारी1500.00
4.गोबर की सड़ी खाद, केचुआ खाद, करज खल्ली3000.00
5.पौधों की रोपाई2000.00
6.सिंचाई एव निकाई-गुड़ाई1500.00
7.कटाई1500.00
8.सुखाई, पैकिंग, भंडारण1500.00
9.अन्य व्यय1200.00
कुलयोगः14000.00

आय – प्रति हेक्टेयर

फसल सुखा 35 क्विंटल

@ 1500 /क्विंटल —– 52500.00

शुद्ध लाभ – ————38500.00 प्रति हेक्टेयर

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